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    भारत में कृषि क्लस्टर |Agricultural Clusters in India

    भारत में कृषि क्लस्टर | Agricultural Clusters in India

    चर्चा में क्यों?

    भारत सरकार ने कृषि निर्यात नीति-2018 (Agri Export Policy-2018) के तहत आंध्र प्रदेश के अनंतपुर और कडप्पा ज़िलों को केला क्लस्टर के तौर पर अधिसूचित किया है। इस परिप्रेक्ष्य में हमने भारत में कृषि क्लस्टर (Agricultural Clusters in India)  से संबंधित सभी पक्षों का समग्रता से विश्लेषण किया है।

    केला क्लस्टर से संबंधित मुख्य बिंदु:

    • आंध्र प्रदेश सरकार, निर्यातक कंपनी तथा कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण इस पहल में एक साथ कार्य करेंगे।
    • निर्यातक कंपनी द्वारा केला उत्पादन को बढ़ाने के लिये आंध्र प्रदेश के केला उत्पादकों को विशेषज्ञता एवं आधुनिक तकनीक प्रदान करने के साथ ही उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा है।

    कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA):

    • इसकी स्थापना भारत सरकार द्वारा कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1985 के अंतर्गत ‘संसाधित खाद्य निर्यात प्रोत्साहन परिषद’ के स्थान पर की गई थी।
    • यह वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
    • इस प्राधिकरण का मुख्यालय नई दिल्ली में है।

    क्लस्टर क्या है?

    बोसवर्थ और ब्रून के अनुसार, “उद्योगों की भौगोलिक विशेषता जो स्थान विशेष की परिस्थितियों के माध्यम से अधिक लाभ प्राप्त करती है” क्लस्टर कहलाती है। क्लस्टर से जुड़े उद्योगों और अन्य संस्थाओं की एक शृंखला होती है जिसमें संबंधित उद्योग घटक, मशीनरी, सेवा और विशेष बुनियादी ढाँचा शामिल होता है। क्लस्टर अक्सर चैनलों के माध्यम से ग्राहकों, कंपनियों के साथ-साथ उद्योग विशेष से संबंधित कौशल एवं प्रौद्योगिकियों के मध्य एकीकृत दृष्टिकोण स्थापित करता है।

    क्लस्टर आधारित कृषि:

    विकासशील देशों में टिकाऊ विकास की सबसे बड़ी संभावना कृषि क्षेत्र में निहित है। यहाँ पर गरीबी व्यापक और खराब स्वरूप में विद्यमान है तथा किसान छोटे पैमाने पर सीमित क्षेत्रों में कृषि करते हैं। विकासशील देशों के ये किसान कम मार्जिन के “संतुलन के चक्र” (Cycle of Equilibrium) से घिरे हैं जहाँ पर सीमित क्षमता और कम निवेश के चलते कम उत्पादकता, कम बाज़ार उन्मुखीकरण जैसी परिस्थितियाँ व्याप्त हैं। इस चक्र को दीर्घकालीन प्रतिस्पर्द्धा के माध्यम से ही तोड़ा जा सकता है।

    भारत में कृषि क्लस्टर (Agricultural Clusters in India) :

    • भारत भौगोलिक, जलवायवीय और मृदा संबंधी विविधता वाले विशाल देशों में से एक है इसीलिये भारत के कृषि स्वरूप में पर्याप्त विविधता है। भारत के विभिन्न क्षेत्र किसी विशेष फसल की कृषि के लिये आदर्श स्थल हैं, उदाहरणस्वरूप गुजरात और महाराष्ट्र में कपास संबंधी आदर्श स्थितियाँ हैं। इसी प्रकार किसी फसल विशेष के संबंध में भी स्थानीय विविधता है, जैसे- मूँगे की विभिन्न किस्मों के लिये कर्नाटक, झारखंड और असम में विशेष परिस्थितियाँ पाई जाती हैं। धान की अमन, ओसों जैसी प्रजातियाँ विभिन्न कृषि क्षेत्रों में बेहतर उत्पादन करती हैं।
    • भारत में कृषि अर्थव्यवस्था के क्षेत्रीकरण संबंधी पूर्व अध्ययनों की जाँच करने के बाद योजना आयोग द्वारा यह सिफारिश की गई थी कि कृषि-आयोजन संबंधी नीतियाँ कृषि-जलवायु क्षेत्रों के आधार पर तैयार की जानी चाहिये। इसी प्रकार संसाधन विकास के लिये देश को कृषि-जलवायु विशेषताओं, विशेष रूप से तापमान और वर्षा सहित मृदा कोटि, जलवायु एवं जल संसाधन उपलब्धता के आधार पर पंद्रह कृषि जलवायु क्षेत्रों में बाँटा गया है।
    • इस प्रकार भारत की कृषि जलवायु विविधता को देखते हुए भारत में क्लस्टर आधारित कृषि की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में खाद्य और कृषि संगठन द्वारा महाराष्ट्र में क्लस्टर से संबंधित कई विशेषताओं उनकी प्रतिस्पर्द्धा या उनकी कमी के कारणों की समीक्षा की।

    भारत में इस प्रकार की कृषि से संभावनाएँ:

    • वे देश जो अधिक खाद्यान उत्पादन करते हैं, की अपेक्षा भारत में अधिक कृषि क्षेत्र है परंतु भारत में विस्तृत कृषि की कमी के कारण उत्पादन के अपेक्षित स्तर को प्राप्त नही किया जा सका है। हरित क्रांति का प्रभाव भी भारत के सीमित क्षेत्रों को ही लाभान्वित कर पाया है, इसी परिप्रेक्ष्य में भारत में विद्यमान सीमांत एवं छोटी जोत वाले कृषि क्षेत्र के मध्य क्लस्टर आधारित कृषि की असीम संभावनाएँ हैं।
    • विभिन्न कृषि क्षेत्रों में आदर्श फसल और उससे संबंधित बुनियादों बातों को ध्यान में रखते हुए विशेष विनियामक रणनीति के माध्यम से कृषको की आय दुगुनी करने संबंधी प्रयोजनों में बेहतर सफलता प्राप्त की जा सकती है।
    • इसके अतिरिक्त भारत में कृषकों की खाद्यान से संबंधित कृषि अवधारणा को व्यावसायिक कृषि में बदल कर स्थानीय प्रवास, रोज़गार और स्थानीय व्यवसाय जैसी फारवर्ड एवं बैकवर्ड सुधारों के माध्यम से कृषि पर निर्भर 50% जनसंख्या कि समस्याओं के बेहतर समाधान के साथ-साथ आर्थिक विकास में कृषि की प्रासंगिक भूमिका निभा सकती है क्योंकि भारत अभी भी विकासशील व कृषि प्रधान देश है।

    समस्याएँ:

    • भारत में कृषि परंपरागत दृष्टिकोण के आधार पर खाद्यान आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये की है जिसमें कौशल, ज्ञान और नवीन तकनीकों का अभाव देखा जाता है। इसके अतिरिक्त कृषकों के समक्ष कृषि एवं फसल संबंधी जानकारियों का अभाव जैसी सामान्य समस्याएँ हैं।
    • भारत में अभी भी समर्पित संस्थाओं, कृषि विशेष क्षेत्रों एवं अनुसंधानों तथा इन अनुसंधानों की जानकारी का कृषकों की पहुँच से दूरी जैसे कारक इस क्षेत्र की सफलता में बाधक बने हैं।
    • खाद्य और कृषि संगठन द्वारा हाल के वर्षों में चिली और अर्जेंटीना जैसे देशों में इस प्रकार की कृषि के सफल प्रयोग किये हैं। इस प्रकार की कृषि के परिणामस्वरूप वहाँ पर कृषि उत्पादन और कृषकों कि आय में बेहतर सुधार देखा गया हैं।

    समाधान:

    • भारत में विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित समर्पित शोध संस्थाओं की स्थापना की जानी चाहिये इसके अतिरिक्त पहले से स्थापित संस्थानों के कार्य निष्पादन में अपेक्षित सुधार किया जाना चाहिये। इस प्रकार के संस्थानों के शोध के आधार पर पाठ्यक्रम एवं तकनीकी ज्ञान का भी प्रसार किया जाना चाहिये।
    • किसी क्षेत्र से संबंधित स्वयं सहायता समूहों (SHG) एवं गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से सामान्य और तकनीकी जानकारी का प्रसार किया जाए इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में कार्यशालाओं का आयोजन किया जाना चाहिये।
    • क्षेत्र विशेष पर समर्पित एप भी बनाए जाने चाहिये ताकि सभी प्रकार की जानकारियों को अद्यतन किया जा सके। इस प्रकार के एप के परिचालन संबंधी क्रिया-कलापों हेतु ग्राम पंचायत और स्थानीय स्तर पर नियमित कार्यशालाओं का किया जाना चाहिये।
    • वित्तीय प्रवाह, अवसंरचना और जागरूकता के साथ-साथ बाज़ार पहुँच जैसी अन्य आवश्यकताओं को पूरा कर भारत अपनी श्रम शक्ति और जनसंख्या का बेहतर प्रयोग अपने आर्थिक एवं मानव विकास के लिये कर सकता है।

    कृषि निर्यात नीति- 2018:

    • कृषि निर्यात नीति, 2018 का उद्देश्य वर्ष 2022 तक कृषि निर्यात को 60 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक करना है।
    • कृषि निर्यात नीति से चाय, कॉफी और चावल जैसे कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ यह वैश्विक कृषि व्यापार में देश की हिस्सेदारी को बढ़ाएगी।
    • कृषि निर्यात नीति में की गईं सिफारिशों को दो श्रेणियों में व्यवस्थित किया गया है-

    सामरिक (Strategic):

    सामरिक श्रेणी में तहत निम्नलिखित उपाय शामिल होंगे-

    • नीतिगत उपाय
    • अवसंरचना एवं रसद समर्थन
    • निर्यात को बढ़ावा देने के लिये समग्र दृष्टिकोण
    • कृषि निर्यात में राज्य सरकारों की बड़ी भागीदारी
    • मूल्य वर्द्धित निर्यात को बढ़ावा देना
    • ‘ब्रांड इंडिया’ का विपणन और प्रचार

    परिचालन (Operational):

    परिचालन के तहत निम्नलिखित कार्य शामिल होंगे-

    • उत्पादन और प्रसंस्करण में निजी निवेश को आकर्षित करना
    • मज़बूत नियमों की स्थापना
    • अनुसंधान एवं विकास
    • विविध

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