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    चुनाव सुधार (Election Reforms) वर्तमान आवश्यकता

    हम अक्सर अपनी राजनीतिक प्रणाली को वर्तमान हालात के लिये दोषी करार देते हैं, लेकिन क्या यह प्रणाली भाव-शून्यता में काम कर रही है? जानकारों की माने तो इस समस्या में समाज की भी स्पष्ट भागीदारी है। हमारी राजनीतिक प्रणाली का व्यवहार समाज के प्रति उनकी प्रतिक्रिया है। इस राजनीतिक प्रणाली को सुधारने के लिये समाज और उसके तंत्रों में सुधार की आवश्यकता है। यहीं से चुनावी सुधार महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में यह आवश्यक है कि देश में सुशासन के लिये सबसे अच्छे नागरिकों को जन प्रतिनिधियों के रूप में चुना जाए। इससे जनजीवन में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है, साथ ही ऐसे उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ती है जो सकारात्मक वोट के आधार पर चुनाव जीतते हैं। लोकतंत्र की इस प्रणाली में मतदाता को उम्मीदवार चुनने या अस्वीकार करने का अवसर दिया जाना चाहिये जो राजनीतिक दलों को चुनाव में अच्छे उम्मीदवार उतारने पर मजबूर करे। कोई भी लोकतंत्र इस आस्था पर काम करता है कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे। यह चुनाव प्रक्रिया ही है जो चुने गए लोगों को गुणवत्ता और उनके प्रदर्शन के माध्यम से हमारे लोकतंत्र को प्रभावी बनाती है।

    इस आलेख में न केवल चुनाव प्रणाली की दरारों एवं ख़ामियों पर चर्चा की जाएगी बल्कि चुनाव सुधार की दिशा में ‘वर्क इन प्रोग्रेस’ के छद्म आवरण से बाहर निकल कर ठोस समाधान भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाएगा।

    चुनाव सुधार (Election Reforms) की आवश्यकता क्यों?

    • राजनीति के जटिल आंतरिक चरित्र और गठबंधन की अंतहीन संभावनाओं के चलते भारत के चुनाव का अनुमान लगाना बेहद कठिन है। भारत के मतदाता संसद या लोकसभा के 543 सदस्यीय निचले सदन के लिये सांसदों का चुनाव करते हैं। क्षेत्र के हिसाब से दुनिया के सातवें बड़े और दूसरी सबसे अधिक आबादी वाले देश में चुनाव कराना बेहद जटिल कार्य है।
    • निर्वाचन अधिकारियों पर अनुचित रूप से राजनीतिक दबाव डाले जाते हैं। फलस्वरूप वे निष्पक्ष रूप से अपना कार्य नहीं कर पाते हैं।
    • भारतीय चुनाव में सत्तारुढ़ दल द्वारा सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग आम बात हो गई है। दलीय लाभों के लिये प्रशासनिक तंत्र के दुरुपयोग के विरुद्ध विपक्षी दल हमेशा आवाज़ उठाते रहे हैं। परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि जब भी विपक्षी दल सत्तारुढ़ हुआ तो वह भी इस दोष से मुक्त नहीं हो पाया है।
    • भारतीय चुनाव प्रणाली की सबसे बड़ी खामी यह है कि चुनाव से पूर्व तक मतदाता सूची अपूर्ण रहती है। परिणामस्वरूप अनेक नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग करने से वंचित रह जाते हैं।
    • निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में बहुलता भी चुनावी प्रणाली की एक बड़ी समस्या है। प्रायः निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रयोग वोट काटने के लिये किया जाने लगा है।
    • इसके अतिरिक्त जाली व फर्ज़ी मतदान की बढ़ती प्रवृत्ति, निर्वाचन आयोग के पास अपने स्वतंत्र कर्मचारी न होना, डाक द्वारा प्राप्त होने वाले मतों के संदर्भ में पर्याप्त अवसंरचना का अभाव इत्यादि हैं।

    स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को प्रभावित करने वाले कारक

    Election Reforms

    • प्रायः उम्मीदवार अपने आपराधिक रिकॉर्ड का ब्यौरा नहीं देते हैं। वे अपनी संपत्ति, देनदारियों, आय तथा शैक्षिक योग्यता का विवरण नहीं देते हैं।
    • चुनाव में धन की बढ़ती भूमिका हमारी चुनाव व्यवस्था का गंभीर दोष है। चुनाव में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। अत्यधिक चुनावी व्यय के कारण सामान्य व्यक्ति निर्वाचन को प्रक्रिया से दूर होता जा रहा है।
    • पिछले कुछ वर्षो में कानून-सम्मत और असल खर्चो के बीच अंतर काफी बढ़ा है।
    • चुनाव जीतने के लिये उम्मीदवार बाहुबल का प्रयोग करते हैं। हिंसा, धमकी और बूथ कैप्चरिंग में बाहुबल की बड़ी भूमिका होती है। यह समस्या पहले अमूमन देश के उत्तरी भागों में हुआ करती थी पर अब बाकी प्रांतों में भी फैल रही है।
    • अपराधी व्यक्ति अपना रसूख और जनता में पैठ बनाने के लिये राजनीति में प्रवेश करते हैं और पुरजोर कोशिश करते हैं कि उनके खिलाफ मामलों को समाप्त कर दिया जाए या उन पर कार्यवाही न की जाए।
    • इसमें उनकी मदद कुछ राजनीतिक दल करते हैं जो धन और रसूख के लिये इन्हें चुनाव मैदान में उतारते हैं और बदले में इन्हें राजनीतिक संरक्षण और सुरक्षा प्रदान करते हैं।
    • किसी भी मज़बूत उम्मीदवार के खिलाफ प्रतिद्वंद्वियों द्वारा बड़े पैमाने पर निर्दलीय उम्मीदवारों को उतारा जाता है ताकि उसके वोट काटे जा सकें।
    • ऐसे कई राजनीतिक दल हैं जो विशेष जाति या समूह से आते हैं। ये जाति, समूह पार्टियों पर भी दबाव डालते हैं कि उन्हें क्षेत्रीय स्वायत्तता और जाति की संख्या के मुताबिक टिकट दिये जाएँ।
    • जाति आधारित राजनीति देश की बुनियाद और एकता पर प्रहार कर रही है और आज जाति चुनाव जीतने में एक प्रमुख कारक बनी हुई है तथा अक्सर उम्मीदवारों का चयन उपलब्धियों, क्षमता और योग्यता के आधार पर न होकर जाति, पंथ और समुदाय के आधार पर होता है।
    • स्वतंत्रता के बाद सांप्रदायिकता और धार्मिक कट्टरवाद की राजनीति ने देश के तमाम हिस्सों में आंदोलनों को जन्म दिया। साथ ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने बहुलवाद और पंथ निरपेक्षता के संघीय ढ़ांचे के लिये गंभीर खतरा पैदा कर दिया है।

    चुनाव सुधार (Election Reforms) से संबंधित समितियाँ एवं आयोग

    • विभिन्न समितियों एवं आयोगों ने हमारी चुनाव प्रणाली तथा चुनावी मशीनरी के साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया की जाँच की है और सुधार के सुझाव दिये हैं। ये समितियाँ एवं आयोग निम्नलिखित हैं-
    • तारकुंडे समिति (वर्ष 1974-75)
    • चुनाव सुधार (Election Reforms) पर दिनेश गोस्वामी समिति (वर्ष 1990)
    • राजनीति के अपराधी करण पर वोहरा समिति (वर्ष 1993)
    • चुनावों में राज्य वित्तपोषण पर इंद्रजीत गुप्ता समिति (वर्ष 1998)
    • चुनाव सुधारों पर विधि आयोग की रिपोर्ट (वर्ष 1999)
    • चुनाव सुधारों पर चुनाव आयोग की रिपोर्ट (वर्ष 2004)
    • शासन में नैतिकता पर वीरप्पा मोइली समिति (वर्ष 2007)
    • चुनाव कानूनों और चुनाव सुधार पर तनखा समिति (वर्ष 2010)


    उपरोक्त समितियों एवं आयोगों की अनुशंसाओं के आधार पर चुनाव प्रणाली, चुनाव मशीनरी और चुनाव प्रक्रिया में कई सुधार किये गए हैं। निम्नलिखित दो कालखंडों में बाँट कर इनका अध्ययन किया जा सकता है।

    • वर्ष 2000 से पूर्व चुनाव सुधार
    • वर्ष 2000 के बाद चुनाव सुधार

    वर्ष 2000 से पूर्व चुनाव सुधार (Election Reforms)

    • संविधान के 61वें संशोधन अधिनियम, 1989 के तहत अनुच्छेद 326 में संशोधन करके मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की गई।
    • चुनाव कार्यों में लगे अधिकारी, कर्मचारियों को चुनाव की अवधि के दौरान चुनाव आयोग में प्रतिनियुक्ति पर माना जाएगा।
    • इस अवधि में ये कर्मी चुनाव आयोग के नियंत्रण में रहेंगे।
    • नामांकन पत्रों को लेकर प्रस्तावकों की संख्या में 10 फीसदी का इज़ाफा किया गया।
    • राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 का अपमान करने पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाना।
    • दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाना और उम्मीदवार की मौत पर चुनाव स्थगित न होना।
    • इस चरण में अब तक के सबसे बड़े चुनाव सुधारों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का प्रचलन में आना शामिल है। इसका लक्ष्य चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष, सटीक और पारदर्शी बनाना है जिससे प्राप्त परिणामों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जा सके।
    • अतः सार्वजनिक क्षेत्र के दो उपक्रमों भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बंगलुरू) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (हैदराबाद) के सहयोग से भारत के चुनाव आयोग द्वारा EVM को तैयार किया गया।
    • दिसंबर 1988 में संसद द्वारा कानून में संशोधन किया गया और जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 में एक नई धारा जोड़ी गई जिसमें आयोग को EVM मशीनों के उपयोग का अधिकार दिया गया।
    • प्रयोग के तौर पर EVM का पहली बार उपयोग वर्ष 1998 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली के चुनावों के दौरान किया गया था।
    • वर्ष 1999 में गोवा विधानसभा चुनाव में पहली बार EVM का पूरे राज्य में प्रयोग हुआ।


    वर्ष 2000 के बाद चुनाव सुधार (Election Reforms)

    1. एक्ज़िट पोल पर प्रतिबंध
    • जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत चुनाव आयोग ने मतदान की शुरूआत होने से लेकर मतदान समाप्त होने के आधे घंटे बाद तक एक्ज़िट पोल को प्रतिबंधित कर दिया है।
    • लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में चुनाव के दौरान एक्ज़िट पोल के परिणाम प्रकाशित करने पर दो वर्ष का कारावास या जुर्माना अथवा दोनों सज़ा हो सकता है।
    1. चुनावी खर्च पर सीलिंग
    • लोकसभा सीट के लिये चुनावी खर्च की सीमा को बढ़ाकर बड़े राज्यों में 70 लाख रुपए कर दिया गया है वहीं छोटे राज्यों में यह सीमा 28 लाख रुपए तक है।
    1. पोस्टल बैलेट के माध्यम से मतदान
    • सरकारी कर्मचारियों और समस्त बलों को चुनाव आयोग की सहमति के बाद पोस्टल बैलेट के माध्यम से मतदान करने की अनुमति है।
    • विदेशों में रहने वाले ऐसे भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार है जिन्होंने किसी अन्य देश की नागरिकता हासिल नहीं की है और उनका नाम किसी भी निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज हो।
    1. जागरूकता और प्रसार
    • युवा मतदाओं को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने के लिये प्रोत्साहित करने हेतु भारत सरकार हर वर्ष 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाती है। यह सिलसिला वर्ष 2011 से शुरू हुआ।
    • 20,000 रुपए से अधिक राजनीतिक चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देना।
    1. नोटा
    • वर्ष 2013 से नोटा व्यवस्था लागू करना एक अहम चुनाव सुधार माना जाता है। नोटा का मतलब है उपरोक्त में से कोई नहीं। यानी नन ऑफ द एबव (None of the above)।
    • यह व्यवस्था मतदाता को किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं देने और मतदाता की पंसद को रिकॉर्ड करने का विकल्प देती है।
    • पहले जब कोई मतदाता किसी उम्मीदवार को वोट नहीं देने का फैसला करता था तो मतदाता को बूथ के पीठासीन अधिकारी को यह बताना होता था और एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करना होता था। लेकिन इससे मतदाता के वोट आफ सिक्रेट बैलेट के अधिकार को नुकसान पहुँचता था।
    1. मतदाता निरीक्षण पेपर ऑडिट ट्रायल
    • यह EVM से जुड़ी एक स्वतंत्र प्रणाली है, जो मतदाताओं को अनुमति देती है कि वे यह सत्यापित कर सकते हैं कि उनका मत उक्त उम्मीदवार को पड़ा है जिसके पक्ष में उसने मत डाला है।
    • जब मत पड़ता है तो एक मुद्रित पर्ची निकलती है जिस पर उस उम्मीदवार का नाम रहता है जिसे मत दिया गया है।
    1. तकनीकी का प्रयोग
    • निर्वाचकों के लिये कंप्यूटरीकृत डेटाबेस का निर्माण, व्यापक फोटो इलेक्टोरल सेवा, फर्जी और डुप्लीकेट इंट्री को खत्म करने के लिये डी-डुप्लीकेशन तकनीक लाना। मतदान प्रक्रिया की विडियो रिकॉर्डिंग कराना।

    आयोग ने ऑनलाइन संचार यानी कोमेट नाम की एक प्रणाली विकसित की है, इससे चुनाव के दिन प्रत्येक मतदान केंद्र की निगरानी करना संभव हो गया है।

    GPS का उपयोग कर मतदान केंद्रों की अब रियल टाइम निगरानी भी की जा रही है।

    चुनाव आयोग ने चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की रिपोर्ट दर्ज़ करने में नागरिकों को सक्षम बनाने के लिये ‘सीविजिल’ एप लॉन्च किया है।

    भारतीय निर्वाचन पद्धति की आलोचना

    भारत में फर्स्ट पास्ट द पोस्ट विधि से जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं। अर्थात हर सीट पर सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार विजयी होता है। इसलिये जिन राजनीतिक दलों के वोट बिखरे हुए हैं, उन्हें कुल मिलाकर अच्छा-खासा वोट मिलने के बावजूद मुमकिन है कि उसके प्रतिनिधि जीतकर न आएँ।
    ये राजनीतिक दल जिन सामुदायिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन समूहों की आवाज़ सदन में अनसुनी रह सकती है। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाजवादी पार्टी को यूपी में लगभग 20% और देश में 4.1% वोट मिले। परिणामस्वरूप वह देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी, फिर भी लोकसभा में उसका कोई प्रतिनिधि नहीं था।
    इसी प्रकार वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को बिहार में 15% वोट मिले, लेकिन उसका एक भी सदस्य चुनाव नहीं जीत पाया। यह प्रणाली भारत की निर्वाचन पद्धति का एक प्रमुख दोष है।


    आगे की राह

    • साफ-सुथरे चुनावों और राजनीतिक पारदर्शिता से ही लोकतंत्र को वैधता मिलती है। ऐसे में महत्त्वपूर्ण चुनावी सुधारों को लागू कराना बहुत ज़रूरी है ताकि लोकतांत्रिक भारत भ्रष्टाचार और आपराधिक माहौल से मुक्त होकर विकास और समृद्धि की ओर अग्रसर हो सके।
    • चुनाव के दौरान नेताओं के धार्मिक स्थलों पर जाने और धार्मिक नारे लगाए जाने पर रोक लगनी चाहिये तथा इसका सख्ती से पालन होना चाहिये।
    • पेड न्यूज़ और फेक न्यूज़ पर सख्ती से रोक लगनी चाहिये। इनके ज़रिये जनमत को प्रभावित करने की कोशिश होती है, जिसका असर चुनावों पर होता है।
    • सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के विनियमन के लिये आचार संहिता निर्मित करने की आवश्यकता है।
    • ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ के मुद्दे पर व्यापक विचार-विमर्श आयोजित करने की आवश्यकता है।

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