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    भारत और जलवायु कूटनीति

    हिमालय एवं एंडीज़ पर्वत शृंखलाओ में पिघलते ग्लेशियर, कैरेबियन एवं ओशिनियाई भूभागों में बढ़ते तूफान और अफ्रीका एवं मध्य पूर्व में बदलता मौसम पैटर्न जलवायु परिवर्तन जनित चुनौतियों की एक भयावह तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन उन महत्त्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है जिसके प्रभावों को प्रत्यक्ष रूप से महसूस किया जा रहा है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के बीच आम सहमति है कि जलवायु परिवर्तन न केवल अंतर्राष्ट्रीय शांति को प्रभावित करता है बल्कि यह राष्ट्रों की सुरक्षा के लिये भी एक बड़ा खतरा है। जानकारों का मानना है कि वैश्विक समुदाय को इन चुनौतियों से निपटने के लिये एक व्यापक गठबंधन की आवश्यकता है, क्योंकि यदि एक देश वैश्विक मानकों का पालन करते हुए अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी करता है और अन्य देश इन मानकों को नज़रअंदाज़ करते हैं तो मानकों का पालन करने वाले देशों को इसका कोई लाभ नहीं होगा और उसे अथक प्रयासों के बावजूद भी जलवायु परिवर्तन के परिणामों का सामना करना होगा।

    जलवायु कूटनीति

    • विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु कूटनीति का आशय अंतर्राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन हेतु एक व्यवस्था विकसित करने और इसके प्रभावी संचालन को सुनिश्चित करने से है।
      • उदाहरण के लिये विकासशील देशों में नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग संबंधी बाज़ार विफलताओं की पहचान करने के उद्देश्य से वर्ष 2000 में G8 रिन्यूएबल एनर्जी टास्क फोर्स की स्थापना हुई थी।
    • सामान्य शब्दों में कहा जा सकता है कि किसी राष्ट्र द्वारा अपनी विदेश नीति में जलवायु परिवर्तन को स्थान देना ही जलवायु कूटनीति कहलाता है।

    जलवायु कूटनीति और भारत

    भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था, बाज़ार और विश्व का दूसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। जानकारों का ऐसा मानना है कि भारत जलवायु कूटनीति के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    • आवश्यकता है कि भारत अपनी विदेश नीति के एजेंडे में जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को शीर्ष स्थान दे। इस प्रकार भारत स्वप्रत्यनों से भी लाभ प्राप्त कर सकता है।
    • जलवायु कूटनीति पर भारत का रुख 1990 के दशक में ‘समान किंतु विभेदित दायित्वों’ (CBDR) के सिद्धांत के माध्यम से पर्यावरणीय उपनिवेशवाद के मुद्दे को उजागर करते हुए विकसित हुआ। जिसने भारत को अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसी संस्था की स्थापना करने के लिये प्रेरित किया।


    पर्यावरणीय उपनिवेशवाद
    उपनिवेशवाद का सामान्य अर्थ उस स्थिति से होता है जिसमें कोई राष्ट्र अन्य राष्ट्रों तक अपनी राजनीतिक शक्ति का विस्तार वहाँ के संसाधनों का अपने हित में शोषण करता है। पर्यावरणीय उपनिवेशवाद की अवधारणा का विकास भी कुछ इसी आधार पर हुआ है दरअसल कई दशकों से अमेरिका जैसे विकसित देश वैश्विक तापमान में वृद्धि के लिये विकासशील देशों जैसे- भारत और चीन को दोषी ठहराते रहे हैं। फलस्वरूप विकासशील देशों द्वारा विकसित देशों के पर्यावरणीय उपनिवेशवाद के दबाव को कम करने के लिये ‘सामान किंतु विभेदित दायित्वों’ के सिद्धांत को अपनाया गया ताकि विकसित देशों के शोषण के कारण विकासशील देशों को अपनी विकासात्मक ज़रूरतों की बलि न चढ़ानी पड़े। ज्ञातव्य है कि यह सिद्धांत जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने में अलग-अलग देशों की विभिन्न क्षमताओं और ज़िम्मेदारियों को स्वीकार करता है।

    • भारत को अपनी जलवायु कूटनीति के संबंध में एक ऐसे विकासात्मक मॉडल को तैयार करने की आवश्यकता है जो अनुकूलन (Adaptation) पर केंद्रित हो और जलवायु परिवर्तन के साथ भारत की समस्त ज़रूरतों को ध्यान में रखता हो तथा वित्त और तकनीक जैसे मुद्दों पर पश्चिम से जुड़ाव को प्रोत्साहित करता हो।
    • पर्यावरण हेतु तकनीकी सहयोग से एक देश का आर्थिक लाभ किसी अन्य देश के साथ स्थाई जुड़ाव सुनिश्चित कर सकता है और जिसका प्रभाव वैश्विक कार्यवाहियों पर भी देखने को मिल सकता है।
      • जर्मनी द्वारा अपने घरेलू कार्यक्रमों के माध्यम से नवीकरणीय उर्जा की कीमतों में कमी करना नवीकरणीय उर्जा के वैश्विक मूल्यों के समर्थन का एक बेहतरीन उदाहरण है।
      • इसी प्रकार यदि भारत भी नवीकरणीय उर्जा को सटीक और सही तरीके से अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में प्रदर्शित करता है तो इससे जलवायु परिवर्तन के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों में भारत का महत्त्व बढ़ेगा।


    बेहतर जलवायु कूटनीति की ओर

    India and Climate Diplomacy

    • समुद्री सुरक्षा: सागर अर्थात् क्षेत्र में सभी की सुरक्षा और सबका विकास (SAGAR- Security and Growth for All in the Region) की नीति भारत की समुद्री रणनीति के केंद्र में है।
      • यह एक समुद्री पहल है जो हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिये भारत की नीति में हिंद महासागर क्षेत्र को प्राथमिकता देती है।
      • जबकि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ ब्लू इकॉनमी की क्षमताओं का लाभ प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है तो ऐसे में आवश्यक है कि वह इस क्षेत्र में क्लाइमेट-रेसिलिएंट पोर्ट्स (Climate-Resilient Ports) को विकसित करने के लिये विस्तृत तकनीकी, तार्किक और नियामकीय कदम उठाए। गौरतलब है कि भारत अपनी जलवायु कूटनीति के माध्यम से यह प्रयास कर सकता है।
    • रणनीतिक संबंध: बढ़ते समुद्री जलस्तर एवं डूबते शहर तथा सुनामी, चक्रवातों और बाढ़ की तीव्रता में निरंतर वृद्धि एक रणनीतिक चिंता का विषय है। जिसके कारण भारत को जलवायु परिवर्तन की चिंताओं के अनुसार अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करने की आवश्यकता है।
      • उदाहरण के लिये भारत ने जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में श्रीलंका के साथ सहयोग बढ़ाने हेतु कई कदम उठाए हैं। जलवायु परिवर्तन के अलावा यदि इन प्रयासों को रणनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो ये इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभावों को सीमित करने में भी मदद कर सकते हैं।
    • खाद्य सुरक्षा: क्लाइमेट-रेसिलिएंट एग्रीकल्चर (Climate-resilient agriculture) के मुद्दे को भारत द्वारा विभिन्न द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ताओं में उठाया जा सकता है तथा स्थाई कृषि उत्पादों के व्यापार को बढ़ावा देकर उनकी मांग में भी वृद्धि की जा सकती है। साथ ही इसकी मदद से वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को भी संबोधित करने में भी काफी मदद मिलेगी।
    • व्यापार: भारत को अपनी व्यापार पद्धति में जलवायु परिवर्तन को ध्यान रखकर आवश्यक बदलाव करना होगा। उदाहरण स्वरूप भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति सचेत जर्मनी के साथ मिलकर वैश्विक व्यापार को बढ़ावा दे सकता है।


    निष्कर्ष


    आवश्यक है कि भारत जलवायु परिवर्तन को अपनी विदेश नीति में प्राथमिकता दे और इसे केवल पर्यावरणीय या आर्थिक दृष्टि से न देखकर इसके रणनीतिक महत्त्व को भी पहचाने। भारत अपनी ‘प्रथम पड़ोस’ (Neighbourhood First) की नीति के माध्यम पड़ोसी देशों की ओर ध्यान देकर जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। जलवायु परिवर्तन को अपनी विदेश नीति का अहम हिस्सा बनाना और जलवायु कूटनीति की ओर अगसर होना भारत को एक संवेदनशील और ज़िम्मेदार वैश्विक नेता के रूप में पेश कर सकता है।

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