• Home
More

    Internet Shutdown|इंटरनेट शटडाउन

    सामान्यतः ऐसा देखा जाता है कि अफवाहों और हिंसक घटनाओं को रोकने के लिये प्रशासन को एहतियातन इंटरनेट बंद या इंटरनेट शटडाउन जैसे कदमों का सहारा लेना पड़ता है। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा लिये गए कुछ निर्णयों जैसे- जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निरसन और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 आदि के संदर्भ में फैली अफवाहों ने देश के विभिन्न हिस्सों में हिंसक विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है,

    • ज्ञातव्य है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध में फैली अफवाहों को रोकने के उद्देश्य से देश के विभिन्न राज्यों जैसे- मेघालय, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में पूर्ण रूप से तथा असम, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में आंशिक रूप से इंटरनेट शटडाउन की घटनाएँ दर्ज की गई हैं।
    • नागरिकता संशोधन अधिनियम के अलावा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का निरसन भी देश में एक संवेदनशील मुद्दा था जिस को लेकर देश के कुछ हिस्सों विशेषकर जम्मू-कश्मीर में काफी विरोध भी हुआ था। विदित है कि जम्मू-कश्मीर में भी सुरक्षा की दृष्टि से अफवाहों और हिंसक घटनाओं को रोकने के लिये सरकार ने 5 अगस्त को इंटरनेट बंद कर दिया था, जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बंद किये हुए आज 135 से ज़्यादा दिन बीत गए हैं परंतु अभी तक वहाँ इंटरनेट सेवाओं की बहाली नहीं की जा सकी है।


    क्या होता है ‘इंटरनेट शटडाउन’ (Internet Shutdown)?

    Internet Shutdown

    • डिजिटल स्वतंत्रता के क्षेत्र में कार्य करते वाली संस्था ‘सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर’ ने वर्ष 2018 में इंटरनेट शटडाउन पर एक पुस्तिका जारी की थी, जिसमें इंटरनेट शटडाउन को परिभाषित करते हुए लिखा था कि ‘समय की एक निश्चित अवधि के लिये सरकार द्वारा एक या एक से अधिक इलाकों में इंटरनेट पर पहुँच को अक्षम करना’ इंटरनेट शटडाउन कहलाता है।
    • इंटरनेट शटडाउन की उपरोक्त परिभाषा के मुख्यतः 2 घटक हैं:
      • पहला यह कि इंटरनेट शटडाउन हमेशा सरकार द्वारा किया जाता है। इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को किसी क्षेत्र विशेष में इंटरनेट सेवाओं को बंद करने का आदेश सरकार की एक निश्चित एजेंसी द्वारा दिया जाता है।
      • इंटरनेट शटडाउन सदैव किसी एक विशेष क्षेत्र में लागू किया जाता है, जहाँ एक क्षेत्र विशेष के सभी लोग इंटरनेट का प्रयोग नहीं कर पाते हैं।
    • विदित है कि इंटरनेट शटडाउन को लेकर विभिन्न संस्थाओं और विशेषज्ञों द्वारा दी गई परिभाषाओं में आंशिक परिवर्तन देखने को मिलता है। जहाँ एक कई परिभाषाओं में सेलेक्टिव बैन को इंटरनेट शटडाउन में शामिल नहीं किया जाता वहीं कुछ जानकार इसे इंटरनेट शटडाउन की परिभाषा का ही एक अंग मानते हैं।
      • कई बार इंटरनेट शटडाउन किसी क्षेत्र विशेष में लागू न करके इसे इंटरनेट पर मौजूद कुछ चुनिंदा सामग्रियों पर लागू किया जाता है और आम जनता तक उनकी पहुँच प्रतिबंधित कर दी जाती है।


    भारत में इंटरनेट शटडाउन

    • इंटरनेट स्वतंत्रता के क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्थाओं द्वारा एकत्रित आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 से अब तक देश भर के तमाम क्षेत्रों में तकरीबन 357 बार इंटरनेट शटडाउन देखा गया।
    • वर्ष 2014 में देश भर में इंटरनेट शटडाउन की संख्या मात्र 6 थी जो वर्ष 2015 में बढ़कर 14 हो गई। वर्ष 2016 और 2017 में इंटरनेट शटडाउन की संख्या क्रमशः 31 और 79 हुईं जो वर्ष 2018 में बढ़कर 134 हो गईं।
    • आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 में दुनिया भर में हुए कुल इंटरनेट शटडाउन में से लगभग 67 प्रतिशत भारत में दर्ज किये गए।
      • आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारत दुनिया भर में इंटरनेट शटडाउन की राजधानी बन गया है।


    जम्मू-कश्मीर में हुआ सबसे ज़्यादा इंटरनेट शटडाउन

    Internet Shutdown

    • वर्ष 2019 में अब तक भारत में कुल 93 बार इंटरनेट बंद करने की घोषणा की गई, जिसके कारण कुल 167 क्षेत्र प्रभावित हुए।
    • भारत में हुए कुल इंटरनेट शटडाउन में से तकरीबन 56 प्रतिशत (अर्थात् कुल 53) शटडाउन केवल जम्मू-कश्मीर में ही देखे गए, जिसमें कुल 93 क्षेत्र प्रभावित हुए।
    • जानकार उग्रवाद और इससे संबंधित अन्य मुद्दों को कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन की प्रमुख वजहों में से एक मानते हैं।
    • अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद से अब लगभग 135 दिन बीत चुके हैं, परंतु अब तक यहाँ इंटरनेट की सेवाएँ बहाल नहीं की गई हैं।
    • जम्मू-कश्मीर के बाद राजस्थान में सबसे अधिक 18 बार इंटरनेट शटडाउन देखा गया।


    इंटरनेट शटडाउन संबंधी कानूनी प्रावधान

    • CrPC की धारा 144
      • धारा 144 जिला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा सशक्त किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट को हिंसा या उपद्रव की आशंका पर उसको रोकने से संबंधित प्रावधान करने का अधिकार देता है ।
      • मजिस्ट्रेट को एक लिखित आदेश पारित करना होता है, जिसके माध्यम से किसी व्यक्ति विशेष या क्षेत्र विशेष में रहने वाले व्यक्तियों के लिये, अथवा आम तौर पर किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में आने या जाने वाले लोगों के लिये इसे निर्देशित किया जा सकता है। गौरतलब है कि आपातकालीन मामलों में मजिस्ट्रेट बिना किसी पूर्व सूचना के भी इन आदेशों को पारित कर सकता है।
      • आँकड़े बताते हैं कि जनवरी 2012 और अप्रैल 2018 के बीच भारत में दर्ज किये गए अधिकांश इंटरनेट शटडाउन का आदेश CrPC की धारा 144 के तहत ही दिया गया था। हालाँकि CrPC की धारा 144 में इंटरनेट शटडाउन के लिये कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया और इंटरनेट शटडाउन संबंधी आदेश इस धारा की व्याख्या के आधार पर दिया जाता है।
    • भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1855 की धारा 5(2)
      • हालाँकि CrPC की धारा 144 अब भी भारत में इंटरनेट पर सामूहिक प्रतिबंध को लागू करने के लिये सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला प्रावधान है, परंतु टेलीग्राफ अधिनियम 1855 की धारा 5(2) का भी कई बार इंटरनेट सेवाओं को रोकने का आदेश देने हेतु प्रयोग किया जाता है।
      • भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1855 भारत में वायर्ड और वायरलेस टेलीग्राफी, टेलीफोन, टेलेटाइप, रेडियो संचार और डिजिटल डेटा संचार के उपयोग को नियंत्रित करता है।
      • भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1855 की धारा 5(2) CrPC की धारा 144 के समान ही है। इस धारा 5(2) में भी इंटरनेट शटडाउन के लिये कोई विशेष प्रावधान नहीं किये गए हैं, परंतु धारा की व्याख्या के आधार पर इस प्रकार के आदेश दिये जा सकते हैं।
    • दूरसंचार अस्थायी सेवा निलंबन (लोक आपात या लोक सुरक्षा) नियम, 2017
      • दूरसंचार अस्थायी सेवा निलंबन (लोक आपात या लोक सुरक्षा) नियम, 2017 के अंतर्गत देश के गृह मंत्रालय के सचिव या राज्य के सक्षम पदाधिकारी को दूरसंचार सेवाओं के निलंबन का अधिकार दिया गया है।


    इंटरनेट शटडाउन का प्रभाव

    • अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: इंटरनेट शटडाउन के कारण विभिन्न देशों को हुए नुकसान का आकलन लगाने के उद्देश्य से ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत को वर्ष 2016 में इंटरनेट शटडाउन के कारण तकरीबन 968 मिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ था। ऑनलाइन बिज़नेस मॉडल अपनाने वाले व्यवसायों को कुछ घंटों के शटडाउन के कारण ही काफी नुकसान का सामना करना पड़ता है।
    • शिक्षा पर प्रभाव: कई बार हम इंटरनेट को सिर्फ व्हाट्सएप, फेसबुक या ट्विटर तक ही सीमित कर देते हैं, परंतु यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि इंटरनेट सिर्फ इन्हीं तक सीमित नहीं है बल्कि इंटरनेट ज्ञान का भंडार भी है जहाँ लगभग सभी विषयों का भरपूर सामग्री मौजूद है। जब किसी क्षेत्र विशेष में लंबे समय के लिये इंटरनेट शटडाउन जारी रहता है तो उस क्षेत्र में रह रहे लोगों विशेषकर विद्यार्थियों पर काफी प्रभाव देखने को मिलता है।
    • मानवाधिकार पर प्रभाव: दुनिया भर के कई देशों में विशेष परिस्थितियों में इंटरनेट शटडाउन का प्रयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया के कामकाज को बाधित करने के लिये एक उपकरण के रूप में किया जाता है। विदित हो कि इस प्रकार के उदाहरण पूर्व में विभिन्न मौकों पर देखें भी गए हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने 1 जुलाई, 2016 को एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें ऑनलाइन सूचना के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिये राष्ट्रों द्वारा किये गए नेटवर्क व्यवधानों और उपायों की निंदा की गई थी। इस प्रस्ताव ने पुष्टि की थी कि ऑनलाइन क्षेत्र में अधिकार विशेष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करने हेतु ऑफलाइन दुनिया नए कानून बनाने की आवश्यकता है।


    इंटरनेट शटडाउन अनुचित क्यों?

    • सवाल यह है कि बार-बार इंटरनेट बंद कर देना कितना सही है वह भी तब, जब सरकार देश को डिजिटल इंडिया बनाने का सपना देख रही है। माना जा रहा है कि इंटरनेट पर रोक लगाने से देश को आर्थिक नुकसान हो होता है, इससे देश के नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी खतरे में आ जाता है।
    • यह समय का वह दौर है, जब व्यावसायिक से लेकर निजी रिश्ते तक डिजिटल कम्युनिकेशन पर निर्भर करते हैं। ऐसे में इंटरनेट बंद होना न सिर्फ असुविधा का कारण बनता है, बल्कि बहुत से मौकों पर सुरक्षा को खतरे में डालने वाला भी साबित हो सकता है।


    इंटरनेट शटडाउन उचित क्यों?

    • हालाँकि, कुछ मौकों पर सरकार का यह फैसला सही भी नज़र आता है। यदि जाट या पाटीदार आंदोलनों के दौरान इंटरनेट बंद नहीं किया गया होता तो शायद हिंसा और भी विकराल हो सकती थी।
    • धार्मिक समूहों में अफवाह के कारण टकराव की संभावना को टालने के लिये भी ऐसा करना सही लगता है।


    आगे की राह

    • इंटरनेट शटडाउन स्पष्ट रूप से वैश्विक और स्थानीय समुदायों के लिये हानिकारक हैं। दुनिया के विभिन्न राष्ट्रों की सरकारों को पता होना चाहिये कि इंटरनेट शटडाउन समाज के कई क्षेत्रों को किस प्रकार प्रभावित करता है।
    • आवश्यक है कि इंटरनेट शटडाउन को प्राथमिक विकल्प के रूप में न देखा जाए, बल्कि किसी भी विशेष मुद्दे को सुलझाने के लिये सरकार को अन्य सभी गैर-शटडाउन विकल्पों पर भी विचार करना चाहिये।
    • सरकारों को इंटरनेट शटडाउन करने से पहले उसकी लागत के प्रभाव का लागत-लाभ विश्लेषण करना चाहिये, क्योंकि कई बार इसके कारण विभिन्न क्षेत्रों पर ऐसा प्रभाव पड़ता है जिसका कारण राष्ट्र को काफी आर्थिक और सामाजिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

    You May Also Like Latest Post rti

    Recent Articles

    पंचायती राज व्यवस्था (Panchayati Raj System) और गांधी दर्शन |

    भारत में प्रतिवर्ष 24 अप्रैल को लोकतंत्र की नींव के रूप में पंचायती राज दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष पंचायती राज...

    इलेक्ट्रॉनिक शिक्षा (Electronic Education): विशेषताएँ और चुनौतियाँ

    पिछले तीन दशकों में जीवन के हर क्षेत्र में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी सेवाओं का काफी विस्तार हुआ है। शिक्षा क्षेत्र भी...

    कृषि व्यवस्था (Agricultural system): अवमंदन से बचाव का बेहतर विकल्प

    यह सर्वविदित है कि कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिये लॉकडाउन की व्यवस्था उपलब्ध विकल्पों में सर्वोत्तम है, परंतु यह...

    संकट में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना (Belt and Road Initiative Project- BRI)

    वर्तमान में विश्व की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाएँ ‘बंद अर्थव्यवस्था’ की अवधारणा से आगे बढ़कर लॉकडाउन की स्थिति में जा चुकी हैं। लॉकडाउन...

    टेलीमेडिसिन (Telemedicine): सार्वजनिक स्वास्थ्य का क्षितिज

    इस वैश्विक महामारी के दौरान स्वास्थ्य देखभाल उद्योग वर्तमान में बड़े पैमाने पर परिवर्तनशील दौर से गुज़र रहा है। इस संकट के...

    Related Stories

    Leave A Reply

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    Stay on op - Ge the daily news in your inbox