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    मेथनॉल अर्थव्यवस्था |Methanol economy

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    1 मेथनॉल अर्थव्यवस्था (Methanol economy)

    मेथनॉल अर्थव्यवस्था (Methanol economy)

    परिचय:

    ऊर्जा को देश के आर्थिक विकास के लिये एक प्रमुख क्षेत्र माना जाता है। भारत वर्ष 2040 तक वैश्विक ऊर्जा मांग वृद्धि में लगभग 25% की हिस्सेदारी के साथ वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की ओर अग्रसर है। देश की ऊर्जा मांग में वर्ष 2040 तक 3.5% की चक्रवृद्धि दर से वार्षिक वृद्धि (Compounded Annual Growth Rate- CAGR) का अनुमान है। भारत ने 2015-16 में अपनी कुल प्राथमिक ऊर्जा मांग के 37% का आयात किया। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आयात निर्भरता 2005-06 में क्रमशः 73% और 17% से बढ़कर 2015-16 में क्रमशः 81% और 40% हो गई। पिछले एक दशक में घरेलू तेल (CAGR- 1.4%) और प्राकृतिक गैस (0.01%) के उत्पादन में वृद्धि भी निराशाजनक रही है। मेथनॉल (Methanol) और डाइमिथाइल ईथर (Dimethyl Ether- DME) भारत के ऊर्जा आयात पर नियंत्रण और भारत की ऊर्जा सुरक्षा में सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

    मेथनॉल  (Methanol) और डाइमिथाइल ईथर का संक्षिप्त विवरण:

    • मेथनॉल (CH3OH) एक एकल कार्बन यौगिक है, जिसका उत्पादन कोयला, प्राकृतिक गैस, बायोमास (अर्थात् वे उत्पाद जो सिन्गैस उत्पन्न करने में सक्षम हैं) से किया जा सकता है। वहीं डाइमिथाइल ईथर (CH3OCH3), जो कि सबसे सरल ईथर यौगिक है, का उत्पादन प्रत्यक्षतः मेथनॉल से या सिन्गैस (syngas) से होता है।
    • मेथनॉल (Methanol) एक दक्ष ईंधन (ऑक्टेन संख्या 100) है। गैसोलीन की तुलना में यह नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और पार्टिकुलेट मैटर (PM) का कम उत्सर्जन करता है। इसमें सल्फर नहीं होने के कारण यह सल्फर ऑक्साइड (SOx) का उत्सर्जन नही करता है। इसे अन्य अनुप्रयोगों के साथ ही परिवहन ईंधन के रूप में प्रयोग करने हेतु गैसोलीन के साथ मिश्रित किया जा सकता है अथवा गैसोलीन के स्थान पर इस्तेमाल किया जा सकता है। हालाँकि मेथनॉल, गैसोलीन की तुलना में अधिक संक्षारक (Corrosive) है और इसके भंडारण एवं वितरण के लिये नए उपकरणों की आवश्यकता पड़ सकती है। यदि शरीर में इसका अंतर्ग्रहण हो जाए तो यह मनुष्यों के लिये विषाक्त भी होता है। मेथनॉल (Methanol) की तरह DME भी एक कुशल ईंधन (सीटेन संख्या – 55-60) है। यह डीज़ल की तुलना में अल्प नाइट्रोजन ऑक्साइड एवं पार्टिकुलेट मैटर उत्सर्जन के साथ दहन करता है। यह भी सल्फर ऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं करता। यह डीज़ल का एक व्यवहार्य और स्वच्छ विकल्प है। इसे LPG के साथ मिश्रित किया जा सकता है। यह एक अविषाक्त यौगिक है और उपयोग व प्रबंधन में सुरक्षित है।
    • मेथनॉल (Methanol) के उपयोग से होने वाला टेलपाइप उत्सर्जन (Tailpipe Emissions) गैसोलीन और डीज़ल जैसे पारंपरिक ईंधन की तुलना में काफी कम होता है। कोयले से मेथनॉल (Methanol) उत्पादन का वेल टू व्हील (Well To Wheel- WTW) उत्सर्जन गैसोलीन की तुलना में अधिक है। बिजली उत्पादन के लिये एक सहजनन संयंत्र (Cogeneration Plant) या एक CCS उपकरण को भी इसके साथ नियोजित कर उत्सर्जन के स्तर को कम किया जा सकता है। उत्सर्जन का यह कम स्तर तभी प्राप्त होगा जब भारत कोयला-जनित मेथनॉल संयंत्र स्थापित करे।

    इसके अतिरिक्त उत्सर्जन की मात्रा प्रयोग की जा रही विभिन्न प्रौद्योगिकियों, संयंत्र से वितरण केंद्रों तक मेथनॉल (Methanol) के परिवहन के लिये उपयोग किये जा रहे परिवहन के माध्यम, कोयला खदान से मेथनॉल संयंत्र की दूरी और अन्य छोटे कारकों पर भी निर्भर करती है। कोयले से मेथनॉल (Methanol) उत्पादन के दौरान उत्सर्जन के प्रसंग में यह बात भी उल्लेखनीय है कि भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन (1.7 टन CO2e प्रति व्यक्ति) वैश्विक औसत का मात्र एक-तिहाई है और यह चीन (7.7 टन CO2e प्रति व्यक्ति), अमेरिका (16.1 CO2e प्रति व्यक्ति) तथा ब्राज़ील (12.3 टन CO2e प्रति व्यक्ति) की तुलना में काफी कम है।

    वैश्विक स्तर पर और चीन में मेथनॉल, डाइमिथाइल ईथर एवं ओलेफिन्स (Olefins) में प्रगति

    • चीन मेथनॉल (Methanol) और DME के सर्वाधिक उत्पादन के साथ विश्व में अग्रणी है। वर्ष 2015 के अनुसार 47 मिलियन टन (MT) उत्पादन के साथ चीन कुल वैश्विक मेथनॉल उत्पादन (85MT) में 55% की हिस्सेदारी रखता है। चीन ने वर्ष 2015 में 3.8 मिलियन टन DME का उत्पादन किया जो विश्व में सर्वाधिक है।

    उपरोक्त दोनों चित्र वर्ष 2015 में वैश्विक स्तर पर और चीन में मेथनॉल (Methanol) की क्षेत्रीय खपत को दर्शाते हैं।

    • उल्लेखनीय है कि चीन अपने कुल मेथनॉल के 70% का उत्पादन कोयले से करता है क्योंकि उसके पास विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कोयले का भंडार है। अन्य देश (संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, ईरान) प्राकृतिक गैस से मेथनॉल का उत्पादन कर रहे हैं क्योंकि उनके यहाँ कम मूल्य पर प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक गैस उपलब्ध है। विश्व के पाँचवें सबसे बड़े कोयला भंडार के साथ भारत भी चीन के पदचिह्नों पर चल सकता है। यदि कोयला भंडारों का कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाए तो ये मेथनॉल और DME उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

    Methanol

    चित्र 3 से स्पष्ट है कि चीन में मेथनॉल (Methanol) की खपत में पिछले दशक में 18% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से वृद्धि हुई है।

    • चीन में कुल DME उत्पादन का 90% LPG सम्मिश्रण में उपयोग कर लिया जाता है। चीन वैकल्पिक ईंधन के एजेंडे का आक्रामक रूप से अनुसरण कर रहा है। वह विशेष रूप से अपनी आयात निर्भरता को कम करने के लिये मेथनॉल का उपयोग कर रहा है। चीन के 15 प्रांतों में पहले से ही लाखों वाहनों में मेथनॉल (M15 से M100) का उपयोग किया जा रहा है। अब वह अपने सभी प्रांतों में मेथनॉल (Methanol) के उपयोग किये जाने की योजना तैयार कर रहा है। इसके अतिरिक्त एक चीनी ऑटो विनिर्माण कंपनी ‘Geely’ ने मेथनॉल ईंधन वाले ऑटोमोबाइल संयंत्र की स्थापना की है जो प्रतिवर्ष 200,000 कारों का निर्माण करेगी।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका एक उत्कृष्ट उदाहरण है जो अपने कच्चे तेल की आयात निर्भरता को कम करने की बहुस्तरीय रणनीति अपनाने के कारण आज विश्व में कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है। हालाँकि शेल तेल (Shale Oil) क्रांति ने इसमें एक प्रमुख भूमिका निभाई है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने कई मेथनॉल कार्यक्रम चलाए हैं। विशेष रूप से कैलिफोर्निया में वर्ष 1980 से 1990 तक गैसोलीन से चलने वाली कारों को मेथनॉल मिश्रित ईंधन (M15 और M85) से संचालित वाहनों में परिवर्तित करने पर ज़ोर दिया गया। हालाँकि 1990 के दशक के अंत तक अमेरिका में परिवहन ईंधन के रूप में मेथनॉल के उपयोग में कुछ कारणों से कमी आई। पेट्रोलियम की कीमतों में वृद्धि के साथ ही मेथनॉल (Methanol) का उपयोग करने से होने वाला आर्थिक लाभ काफी कम रह गया। अब मेथनॉल को इथेनॉल की तरह परिवहन ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने के लिये कोई मज़बूत तर्क मौजूद नहीं था। अंततः 2005 के बाद इथेनॉल ने कैलिफोर्निया में मेथनॉल के उपयोग को विस्थापित कर दिया। इसके कारण वर्ष 2010 में इथेनॉल मिश्रित ईंधन ने गैसोलीन के उपयोग को 7% तक विस्थापित कर दिया और वर्ष 2011 में अमेरिका में E85 पर चलने वाले दोहरे ईंधन वाहनों (Flexible Fuel Vehicles- FFVs) की संख्या 8.3 मिलियन तक पहुँच गई।
    • कोयला, प्राकृतिक गैस या मेथनॉल (Methanol) से प्राप्त ओलेफिन्स (Olefins) एथिलीन, प्रोपलीन जैसे पेट्रोकेमिकल्स के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। साथ ही वैश्विक स्तर पर और चीन में प्लास्टिक एवं डिटर्जेंट के लिये एक आरंभिक सामग्री के रूप में काम आ रहे हैं। वर्ष 2015 में चीन के पास 4.5 मिलियन टन कोयला-जनित ओलेफिन्स (coal to olefins- CTO) उत्पादन की क्षमता थी और उसने इसका 3.9 मिलियन टन का उत्पादन किया। हालाँकि मेथनॉल (Methanol) के माध्यम से कोयला-जनित ओलेफिन्स के निर्माण की एक प्रमाणित तकनीक है और वैश्विक स्तर पर इसका व्यवसायीकरण हुआ है। कच्चे तेल के कम मूल्यों ने अस्थायी रूप से इसकी प्रतिस्पर्द्धा को कम कर दिया है। चीन में वाणिज्यिक परिचालन ने संकेत दिया है कि कोयला-जनित ओलेफिन्स के उत्पादन का ब्रेक-ईवन (वह स्थिति जहाँ लाभ लागत के बराबर हो) भी लगभग 40-42 डॉलर प्रति बीबीएल है।

    भारत में मेथनॉल (Methanol) की स्थिति:

    • भारत मेथनॉल (Methanol) उत्पादन और उपयोग के मामले में अभी प्रारंभिक अवस्था में होने के बावजूद इसके व्यापक अनुप्रयोगों को देखते हुए इसकी व्यापक संभावना नज़र आती है। भारत में मेथनॉल के 5 प्रमुख उत्पादक हैं – गुजरात नर्मदा वैली फ़र्टिलाइज़र एंड केमिकल्स लिमिटेड, दीपक फ़र्टिलाइज़र्स, राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फ़र्टिलाइज़र्स, असम पेट्रोकेमिकल्स और नेशनल फ़र्टिलाइज़र्स लिमिटेड।
    • 2010-11 से 2015-16 के बीच मेथनॉल के घरेलू उत्पादन में 57% तक गिरावट आई, जबकि इसी अवधि में इसके खपत में 61% की वृद्धि हुई। चूँकि मेथनॉल (Methanol) की स्थापित उत्पादन क्षमता काफी हद तक स्थिर रही है। घरेलू उत्पादन में गिरावट से मेथनॉल (Methanol) उद्योग के क्षमता उपयोग कारकों में निरंतर गिरावट आई है।

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    उपरोक्त तालिका 2 से पता चलता है कि भारत में मेथनॉल (Methanol) आयात में लगातार वृद्धि हुई है और 2010-11 से 2015-16 तक यह दोगुने से अधिक हो गया है। हालाँकि भारत मेथनॉल (Methanol) का निर्यात भी करता रहा है लेकिन आयात की तुलना में यह मात्रा अत्यंत कम है।

    • भारत द्वारा अपनी क्षमताओं का अब तक दोहन नहीं किया जा सका है। उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये मेथनॉल का आयात करना पड़ता है। वस्तुतः भारत अपनी मेथनॉल आवश्यकता के 90% की पूर्ति आयात से ही करता है। ऐसा मुख्यतः इसलिये है कि घरेलू उत्पादन की तुलना में आयात करना उसके लिये अधिक सस्ता है। भारत अपने मेथनॉल का 99% ईरान (1.31 मिलियन टन) और सऊदी अरब (0.38 मिलियन टन) से आयात करता है। वहाँ मेथनॉल (Methanol) का उत्पादन प्राकृतिक गैस से होता है जो उन देशों में बहुत कम मूल्य पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। दूसरी ओर भारत के मेथनॉल उत्पादन के लिये आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भर होने के कारण वह आयात की तुलना में अपनी प्रतिस्पर्द्धा खो देता है। यद्यपि भारत के पास मेथनॉल (Methanol) संयंत्र के लिये वाणिज्यिक कोयला उपलब्ध नहीं है, लेकिन उसके पास कोयले के बड़े भंडार मौजूद हैं। वह प्रतिस्पर्द्धी मूल्यों पर फीडस्टॉक के रूप में कोयले का उपयोग कर मेथनॉल का उत्पादन कर सकता है। इसके अतिरिक्त मेथनॉल (Methanol) के आयात पर उल्लेखनीय विदेशी मुद्रा बहिर्वाह का परिदृश्य बनता है जो नीचे दिये गए आँकड़ों में दर्शाया गया है।

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    • 2015-16 में भारत ने 2853 करोड़ रुपए मूल्य के मेथनॉल (Methanol) का आयात किया, जबकि निर्यात 82 करोड़ रुपए मूल्य का था। इसके कारण शुद्ध आयात मूल्य 2771 करोड़ रुपए का रहा जो कि बहुत अधिक था। हालाँकि भारत का मेथनॉल निर्यात मामूली ही है फिर भी इसके निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक रोमानिया, यूएई और श्रीलंका को जाता है।

    भारत में मेथनॉल (Methanol) उत्पादन की आर्थिक व्यवहार्यता:

    • भारत अपने समग्र मेथनॉल (Methanol) का उत्पादन आयातित प्राकृतिक गैस से कर रहा है। इसे मेथनॉल उत्पादन के लिये कोयले का उपयोग करना चाहिये जो भारत में मेथनॉल उत्पादन को आर्थिक रूप से अधिक व्यावहारिक बना सकता है। भारत को मेथनॉल (Methanol) उत्पादन के लिये एक प्रायोगिक संयंत्र स्थापित करना चाहिये, जिसके बाद वाणिज्यिक संयंत्र स्थापित किया जा सकता है। चूँकि भारत में मेथनॉल संयंत्र के लिये
    • वाणिज्यिक कोयला उपलब्ध नहीं है, इसलिये प्रति यूनिट मेथनॉल उत्पादन की सटीक लागत की गणना करना कठिन होगा। यह आकलन किया जाता है कि 1600 टन प्रतिदिन उत्पादन वाले मेथनॉल संयंत्र के लिये 1200 करोड़ रुपए के पूंजीगत व्यय की आवश्यकता होगी। यह 17-19 रुपए प्रति लीटर पर मेथनॉल के उत्पादन में सक्षम होगा जो आयातित मेथनॉल की लागत के साथ वहनीय है। वर्तमान में भारत में मेथनॉल उत्पादन की दर 25-27 रुपए प्रति लीटर है जो आयातित प्राकृतिक गैस के मूल्य में उतार-चढ़ाव पर निर्भर है। फीडस्टॉक के रूप में कोयले का उपयोग करने के अलावा बायोमास/नगरपालिका के ठोस अपशिष्ट और फ्लेयर्ड प्राकृतिक गैस (Flared Natural Gas) का उपयोग भी मेथनॉल (Methanol) उत्पादन के लिये किया जा सकता है। इनकी निरंतर उपलब्धता की चुनौती के कारण भारत में मेथनॉल (Methanol) उत्पादन के लिये कोयला ही सबसे उपयुक्त ईंधन प्रतीत होता है।

    भारत के लिये अवसर:

    चूँकि कोयले से मेथनॉल के उत्पादन की एक प्रमाणित तकनीक होने के कारण भारत को गैसोलीन और डीज़ल के विकल्प के रूप में मेथनॉल (और DME व Olefins) के उत्पादन के लिये अपने बड़े कोयले के भंडार का दोहन करना चाहिये। कोयले का कम वैश्विक मूल्य और कड़े पर्यावरण कानून कोयले से मेथनॉल उत्पादन में उपयुक्त लाभ प्रदान कर सकते हैं। मेथनॉल और DME भारत में निम्नलिखित अवसर प्रदान करते हैं:

    1. मेथनॉल और DME का परिवहन ईंधन के रूप में उपयोग:

    • मेथनॉल और DME को गैसोलीन और डीज़ल के साथ मिश्रित किया जा सकता है। ये गैसोलीन और डीज़ल को पूरी तरह से प्रतिस्थापित कर सकते हैं। इससे हमें आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को कम करने का अवसर मिलेगा। भारत द्वारा निर्धारित वर्ष 2022 तक 2014-15 के स्तर की तुलना में तेल और गैस की आयात निर्भरता में 10% की कमी लाने के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को वैकल्पिक ईंधन के रूप में मेथनॉल और DME के उपयोग से सहयोग मिल सकता है। उच्च मेथनॉल मिश्रण ‘वाहन की दक्षता’ में उल्लेखनीय सुधार लाता है। इससे वाहन की क्षमता में 25% तक की वृद्धि होती है।
    • यह रेलवे इंजनों को भी मेथनॉल/DME मिश्रण पर संचालित करने का अवसर प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त भारत की प्रमुख सागरमाला परियोजना के तत्त्वावधान में एक वृहत् जल परिवहन प्रणाली के निर्माण के अंतर्गत तटीय क्षेत्रों में 40 मिलियन टन इस्पात क्षमता स्थापित की जानी है। लगभग 80 मिलियन टन कोयले का परिवहन जलमार्गों के माध्यम से किया जाएगा। इस प्रकार डीज़ल से संचालित जहाज़ों से होने वाले प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये मेथनॉल और DME से संचालित जहाज़ न केवल लागत प्रभावी विकल्प प्रदान करेंगे, बल्कि इससे प्रदूषण भी न्यूनतम होगा।

    2. मेथनॉल और DME का उपयोग: स्वच्छ रसोई ईंधन तक सबकी पहुँच

    • भारत में लगभग 800 मिलियन लोगों के पास स्वच्छ रसोई ईंधन मौजूद नहीं है और वे खाना पकाने के लिये मुख्यतः बायोमास के उपयोग पर निर्भर हैं। स्वच्छ रसोई ईंधन तक इस आबादी को पहुँच प्रदान के लिये सरकार ने मई 2016 में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) की शुरुआत की जिसके तहत गरीबी रेखा से नीचे (BPL) के परिवारों के बीच 5 करोड़ LPG कनेक्शन वितरित किये जाएंगे। 2015-16 में भारत ने अपनी LPG आवश्यकताओं का 46% आयात (9 MT) किया। LPG के माध्यम से स्वच्छ रसोई ईंधन तक पहुँच बढ़ाने की सरकार की महत्त्वाकांक्षा को देखते हुए स्पष्ट है कि निकट भविष्य में देश के LPG आयात में और वृद्धि होगी। चूँकि कच्चे तेल के मूल्यों में नरमी आई है और कच्चे तेल का आयात बिल 2012-13 के 144 बिलियन डॉलर से घटकर 2015-16 में 64 बिलियन डॉलर रह गया है। अभी कम मूल्य के कारण LPG आयात अर्थव्यवस्था पर अधिक भार नहीं डाल रहा, लेकिन कच्चे तेल का अभाव मूल्य (Scarcity Value) और इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए यह स्पष्ट है कि दीर्घावधि में कच्चे तेल के मूल्यों में वृद्धि ही होगी। इस प्रकार LPG के साथ मेथनॉल या DME का मिश्रण या इनके द्वारा LPG का पूर्ण प्रतिस्थापन न केवल धीरे-धीरे LPG के आयात को समाप्त कर सकता है, बल्कि भारत में स्वच्छ रसोई ईंधन तक पहुँच बढ़ाने में भी मदद करेगा।

    3. दूरसंचार टॉवर्स में डीज़ल का प्रतिस्थापन:

    • बड़ी संख्या में दूरसंचार टॉवर्स, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार बिजली कटौती के कारण दिन में 18-20 घंटे तक डीज़ल पर चलते हैं। भारत में दूरसंचार टॉवर्स में लगभग 2% डीज़ल (1.5 मिलियन टन) की खपत होती है जो एक बड़ी मात्रा है जिसे DME द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है।

    4. विभिन्न रसायनों का उत्पादन:

    • मेथनॉल का उपयोग फोर्मेल्डीहाइड, एसिटिक एसिड और ओलेफिन्स जैसे रसायनों के उत्पादन के लिये किया जा सकता है। इन्हें निर्यात कर अधिक विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।

    5. स्वच्छ भारत अभियान से संबद्ध करना:

    • कोयले के अतिरिक्त बायोमास/MSW से मेथनॉल का उत्पादन भी भारत के लिये एक व्यवहार्य विकल्प हो सकता है। इसे स्वच्छ भारत अभियान के साथ संबद्ध किया जा सकता है। भारत में बायोमास की वर्तमान उपलब्धता 500-650 मिलियन टन तक है। इसके लिये एक उपयुक्त आपूर्ति शृंखला तंत्र का निर्माण करना होगा ताकि मेथनॉल उत्पादन के लिये बायोमास की निरंतर उपलब्धता बनी रहे। इसके अतिरिक्त यह भारत के लिये एक अवसर हो सकता है कि वह अपने ठोस अपशिष्ट का उपयोग मेथनॉल उत्पादन के लिये करे। इससे मिट्टी में विषाक्त पदार्थों के रिसाव और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसी समस्याओं पर भी रोक लगेगी।
    • इस प्रकार उपरोक्त विकल्प भारत के लिये सरलता से प्राप्त हो सकने वाले लाभ हैं और सरकार के मौजूदा लक्ष्यों के साथ इसकी प्रत्यक्ष प्रासंगिकता है। कच्चे तेल के न्यून वैश्विक मूल्यों के परिदृश्य में मेथनॉल/DME उत्पादन में निवेश करना भले अभी अधिक आकर्षक न लगे और अभी भारत राहत की स्थिति में हो, लेकिन जब कच्चे तेल के मूल्यों में पुनः उछाल आएगा तब मेथनॉल और DME अत्यंत महत्त्वपूर्ण साबित होंगे।

    नीति आयोग द्वारा मेथनॉल अर्थव्यवस्था पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन:

    • नीति आयोग ने 6-7 सितंबर, 2016 को मेथनॉल इकोनॉमी पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें भारत और विश्व भर के औद्योगिक प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं, सरकारी अधिकारियों आदि ने व्यापक भागीदारी की। सम्मेलन का मुख्य निष्कर्ष यह रहा कि भारत को ईंधन के रूप में मेथनॉल और DME पर बल देने की आवश्यकता है। नीति आयोग मेथनॉल उत्पादन हेतु एक प्रायोगिक संयंत्र के निर्माण पर कार्य कर रहा है ताकि दीर्घावधि में विश्व और भारत के हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था में रूपांतरित होने से पहले भारत मेथनॉल अर्थव्यवस्था की ओर एक बड़ी छलाँग लगा सके।

    आगे की राह:

    • पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कदम यह होगा कि एक नवाचार कोष (Innovation Fund) का निर्माण किया जाए जो भारत में मेथनॉल/DME के लिये अनुसंधान एवं विकास (R&D) गतिविधियों का समर्थन करेगा। इसके उपरांत भारत में कोयले से मेथनॉल के उत्पादन के लिये एक प्रायोगिक संयंत्र (Demonstration Plant) का निर्माण किया जाना चाहिये।
    • भारत में पर्याप्त मात्रा में मेथनॉल उत्पादन की क्षमता का होना आवश्यक है ताकि उपयोगकर्त्ता उद्योगों को आपूर्ति का आश्वासन दिया जा सके। इसके साथ ही फ्लेक्सी-फ्यूल वाहनों (Flexi-Fuel Vehicles) का विकास किया जाना चाहिये जो मेथनॉल/DME ईंधन मिश्रणों पर चलने में सक्षम होंगे। मेथनॉल/DME पर संचालित रसोई स्टोव के विकास के लिये एक अलग कार्यक्रम भी शुरू किया जा सकता है।
    • इसी प्रकार डीज़ल संचालित रेलवे इंजनों को मेथनॉल/DME आधारित इंजनों में परिवर्तित करने के लिये भी एक कार्यक्रम शुरू किया जा सकता है। भारत को ईरान या कतर में मेथनॉल/DME के लिये एक उत्पादन संयंत्र की स्थापना के विकल्पों पर भी विचार करना चाहिये क्योंकि इन दोनों देशों के पास कम मूल्यों पर उपलब्ध हो सकने वाला प्राकृतिक गैस का विशाल भंडार मौजूद है।
    • विदेशों में उत्पादित मेथनॉल/DME का भारत में इसके प्रत्यक्ष अनुप्रयोग या ओलेफिन्स जैसे रसायनों में इसके रूपांतरण के लिये किया जा सकता है। हालाँकि इस परिदृश्य में संभव है कि भारत मेथनॉल का आयातक देश बनकर रह जाए लेकिन फिर भी यह कच्चे तेल के आयात की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक लाभप्रद होगा।
    • इसके अलावा भारत को एक वृहत कोयला आधारित परिसर स्थापित करना चाहिये जहाँ बिजली, मेथनॉल और उर्वरक का उत्पादन एकीकृत तरीके से हो सके। यह विविध वस्तुओं की उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी लाएगा।
    • एक कार्यबल का गठन किया गया है जो देश में मेथनॉल उत्पादन, वितरण और उपयोग के समग्र ढाँचे के विकास की दिशा में कार्य करेगा।
    • संभावित है कि सरकार 2022 तक पेट्रोल/डीज़ल में 15% मेथनॉल/DME सम्मिश्रण के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ेगी। यदि इस लक्ष्य की प्राप्ति हुई तो वर्ष 2022 तक 8 बिलियन डॉलर की बचत (वर्ष 2016-17 में भारत के कच्चे तेल व्यय के संदर्भ में जिसमें मध्यम व दीर्घावधि में वृद्धि की संभावना है) हो सकती है।
    • हाल ही में कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) ने पश्चिम बंगाल में कोयला आधारित मेथनॉल संयंत्र स्थापित करने की अपनी योजना प्रस्तुत की है और कोयला गैसीकरण प्रौद्योगिकी के लाइसेंसधारियों से निविदाएँ आमंत्रित भी कर ली हैं। यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। एक मेथनॉल अर्थव्यवस्था की ओर भारत की छलाँग न केवल उसकी आयात निर्भरता को कम करेगा बल्कि भारत इससे अपने कार्बन फुटप्रिंट को भी काफी कम कर सकता है।

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